Mar 06, 08:01 pm
'उड़ गई चिड़िया
कापी, फिर
थिर-हो गई पत्ती।'
सच्चिदानद हीरानद वात्स्यायन अज्ञेय हिन्दी के कालजयी रचनाकार है। उन्हे प्रयोगवाद का प्रवर्तक कहा जाता है। वस्तुत: उनका पूरा रचना ससार परम्परा और प्रयोग का विलक्षण सहमेल है। राहों के अन्वेषी अज्ञेय उन यायावर रचनाकारों में अग्रगण्य हैं जिन्होंने शब्द की सस्कृति को नयी आभा प्रदान की। अज्ञेय के व्यक्तित्व और लेखन को लेकर जाने कितने विवाद उठे। कई बार 'मौन भी अभिव्यजना है' में विश्वास रखने वाले अज्ञेय ने अपने मितकथनों से भी इन चर्चाओं को बल दिया। अपने सरोकारों पर टिप्पणी करते हुए एक बातचीत में वे कहते है, 'मेरे लिए महत्व की बात यह है कि अपने और अपने आसपास के बीच जो सबध है उसे जानने पहचानने का प्रयत्न करूं। उसके सभी स्तरों को समग्रता और जटिलता में, और पहचान के सहारे उस स्वाधीनता को बढ़ाऊं और पुष्ट करूं जो मेरे मानव की सबसे मूल्यवान उपलब्धि है।'
7 मार्च 1911 को कुशीनगर, उ.प्र. के एक पुरातत्व-उत्खनन शिविर में जनमे अज्ञेय को ज्ञान की कई धाराएं विरासत में मिली थीं। उनके पिता प. हीरानद शास्त्री बहुविद्याविशारद थे। लाहौर से बीएससी करने वाले अज्ञेय को सस्कृत, फारसी, अंग्रेजी, बाग्ला सहित कई भाषाओं का ज्ञान था। अपनी मा व्यती देवी के साथ 1921 में उन्होंने पजाब की यात्रा की थी, उनके मन में स्वाधीनता और सघर्ष के बीज इसी समय पड़े। परवर्ती अज्ञेय को देखकर बहुतेरों के लिए यह विश्वास करना कठिन होता था कि यह व्यक्ति 'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन आर्मी' का सक्रिय सदस्य था। चद्रशेखर आजाद, भगवतीचरण वोहरा, सुखदेव आदि अनेक क्रातिकारियों से अज्ञेय की घनिष्ठता रही। कई बार गिरफ्तार हुए, जेल गये, कालकोठरी में रहे, अपने घर में नजरबद किये गये। अज्ञेय में स्वाधीनता की यह ललक उनके साहित्य में भाति-भाति से प्रतिबिम्बित हुई। उन्होंने 1924 में पहली कहानी लिखी। सच्चिदानद हीरानद को अज्ञेय नाम जैनेन्द्र कुमार ने दिया था।
अज्ञेय सचमुच बहुमुखी व्यक्तित्व थे। उन्होंने खुद लिखा कि जूता गाठने से लेकर बहुत सारे काम करके वे अपनी आजीविका चला सकते है। एक पत्रकार के रूप में सैनिक, विशाल भारत, प्रतीक, थॉट, वाक्, दिनमान, नया प्रतीक और नवभारत टाइम्स में उनके योगदान को बहुमूल्य माना जाता है। रचनाकार के रूप में शीर्षस्थानीय महत्व तो है ही, रचनात्मक आदोलनों के नेतृत्व की जो समझ उनमें थी वह दुर्लभ है। तारसप्तक सहित 'सप्तक चतुष्टय' की परिकल्पना और परिणति ने हिन्दी साहित्य में नया इतिहास रचा। उन्हें प्रयोगवाद से जोड़ना स्वाभाविक है, 1943 में 'तारसप्तक' छपा था, लेकिन अज्ञेय प्रयोगवाद की रूढ़ अवधारणाओं व फल श्रुतियों को मीलों पीछे छोड़ देने वाले रचनाकार है।
अज्ञेय ने समान शब्द सिद्धि के साथ कविता, कहानी, उपन्यास, निबध, आलोचना, यात्रा वृत्तात, डायरी, रिपोर्ताज, सस्मरण आदि विधाओं में प्रचुर लेखन किया। भग्नदूत, चिन्ता, हरी घास पर क्षण भर, बावरा अहेरी, आगन के पार द्वार, कितनी नावों में कितनी बार, सागर मुद्रा, पहले मैं सन्नाटा बुनता हू और ऐसा कोई घर आपने देखा है सहित सोलह सग्रहों में उनकी कविताएं मौजूद है। सचयन आदि तो हैं ही। अज्ञेय की कविता के बीज शब्द है- स्वतत्रता, निजता, व्यक्ति, मौन, करुणा, प्रकृति, रहस्य, अपार, अन्वेषण और जीवन। श्रद्धा और समर्पण को भी जोड़ा जा सकता है। जन्म दिवस, हरी घास पर क्षण भर, कलगी बाजरे की, नदी के द्वीप, बावरा अहेरी, यह दीप अकेला, चक्रात शिला, असाध्य वीणा और एक सन्नाटा बुनता हू आदि अनेकानेक कविताओं में अज्ञेय हिन्दी कविता को अभूतपूर्व गरिमा प्रदान करते है। निश्चित रूप से वे 'व्यक्तित्व के वैभव' को रेखाकित करते है, पर उन्हे व्यक्तिवाद में सीमित करना अन्याय है। विदेशी साहित्य का सघन पाठक होने के नाते उनपर विचारधाराओं व शैलियों के प्रभाव भी देखे जा सकते है। इन सबके बीच अज्ञेय की मौलिकता अनन्य है। 'भीतर जागादाता' कविता में लिखते है, 'लो, यह स्मृति, यह श्रद्धा, यह हसी/ यह आहूत, स्पर्शपूत भाव/ यह मैं, यह तुम, यह खिलना/ यह ज्वार, यह प्लावन/ यह प्यार, यह अडूब उमड़ना-/ सब तुम्हे दिया।' वे हिन्दी कविता के एक बड़े समय और उन्नयन का नेतृत्व करते है। कई परवर्ती बड़े कवियों पर अज्ञेय का प्रभाव दिखता है। कथासाहित्य में अज्ञेय का हस्तक्षेप युगान्तरकारी है। 'शेखर: एक जीवनी' , 'नदी के द्वीप' और 'अपने-अपने अजनबी' उपन्यास व्यक्ति और समाज की विभिन्न विडम्बनाओं से जूझते है। स्त्री, प्रेम, इच्छा, विरक्ति, मर्यादा, विद्रोह, सस्कार आदि को अज्ञेय नये सिरे से परिभाषित करते है। उनकी कहानियों के सात सग्रह है। जिनमें गैंग्रीन, हीली-बोन् की बत्तखें, मेजर चौधरी की वापसी, शरणार्थी आदि को क्लैसिक का दर्जा मिल चुका है। अज्ञेय के पास शब्दार्थ को पहचानने और उसे व्यक्त कर सकने की जो अपूर्व क्षमता है वह हिन्दी गद्य को बदल देती है। 'हीली बोन् की बत्तखें' के अंतिम वाक्य है, 'कैप्टेन दयाल ने कुछ कहना चाहा, पर अवाक् ही रह गये, क्योंकि उन्होंने देखा, हीली की आखों में वह निव्र्यास सूनापन घना हो आया है जो कि पर्वत का चिरन्तन विजन सौंदर्य है।'
'अरे यायावर रहेगा याद' और 'एक बूंद सहसा उछली' में अज्ञेय के यात्रा वृत्तात है। देश और विदेश में घूमते अज्ञेय इन वर्णनों से पाठक की चित्तवृत्ति उदार बनाते है। वे 'कविर्मनीषी' थे। लगभग बारह सग्रहों में उनके निबध है जिनके केंद्र में साहित्य, सस्कृति, विकास और मनुष्यता से जुड़े अनेक प्रश्न है। यहा उनकी 'तार्किक भारतीयता' दिखाई पड़ती है। कुट्टिचातन नाम से अज्ञेय ने अनेक ललित निबध लिखे जो 'सबरग', 'सबरग और कुछ राग' व 'छाया का जंगल' आदि में है। उनका गीतिनाट्य 'उत्तर प्रियदर्शी' युद्ध, शाति और करुणा को समकालीन सदर्भो में व्याख्यायित करता है। 'भवन्ती', 'अन्तरा', 'शाश्वती' आदि डायरी पुस्तकें और 'स्मृतिलेखा' व 'स्मृति के गलियारों से' सस्मरण सग्रह अज्ञेय के सृजन और चिन्तन के अनूठे साक्ष्य है। सप्तक श्रृंखला सहित अठारह से अधिक ग्रंथों का सपादन किया। अज्ञेय एक मर्मान्वेषी अनुवादक भी थे। उनका अवदान विपुल व बहुमूल्य है। अज्ञेय के जन्मशती वर्ष में उनके साहित्य के पुनर्मूल्याकन के बहुतेरे उपक्रम हो रहे है। कई आलोचक पश्चाताप भाव से भर उठे है कि हमने वाद ग्रस्तता के कारण इतने बड़े शब्द शिल्पी की अनदेखी की। कुछ आलोचक ऐसे भी है जो इस 'स्मरण वर्ष' की भावुकता से लाभ उठाकर 'मार्क्सवादियों को मुंहतोड़ जवाब' जैसी वीरोचित व्याख्याएं कर रहे है। वस्तुत: ये दोनों ही उपक्रम इस बात के प्रतीक है कि अज्ञेय जैसे बड़े रचनाकार को समझने में होने वाली भूलें हिन्दी समाज का सहज स्वभाव जैसी है। अज्ञेय ने एक जगह 'बुद्धिजीवी' और 'बौद्धिक' का फर्क स्पष्ट किया है। उन्हें बौद्धिक के रूप में ही समझा जा सकता है। प्रेम, प्रकृति और स्वाधीनता आदि अनेक रचनात्मक विशेषताएं अज्ञेय को बड़ा बनाती है। युवा आलोचक व कवि पकज चतुर्वेदी उनकी जीवन दृष्टि को रेखाकित करते हुए कहते है कि, 'मनुष्य की अनियत्रित स्वार्थपरता, भोगवाद और क्रूरता के मद्देनजर यह कवि की भविष्य-दृष्टि के प्रेसिशन या अचूकता की मिसाल है। अज्ञेय इसलिए बड़े कवि है कि उनमें सुंदर और उदात्त की अभिव्यक्ति की सस्कृति ही नहीं, धारा के विरुद्ध जाकर अप्रिय और असुविधाजनक सच कहने का साहस भी था।' अपने सच को ही कहने की बात करने वाले अज्ञेय कई बार अप्रत्याशित भी है, जिससे उन्हे समझने में कई कठिनाई हो सकती है। रागात्मक सबधों पर तो उनकी अभिव्यक्तिया अद्वितीय है। प्रकृति का इतना बड़ा प्रेमी भी मिलना कठिन है।
अज्ञेय लिखते है, 'मैं वह धनु हू, जिसे साधने में प्रत्यचा टूट गई है/ स्खलित हुआ है वाण, यद्यपि ध्वनि दिग्दिगन्त में फूट गई है-।' सच यही है कि ऐसे रचनाकार की 'शब्द में समाई कठिन होती है। अज्ञेय भारतीय साहित्य को गौरव प्रदान करने वाले महान रचनाकार है।
[ सुशील सिद्धार्थ]
बी2/8, केशवपुरम् लारेस रोड,
नयी दिल्ली- 35
[आज 7 मार्च 2011 को है कालजयी साहित्यकार अज्ञेय की 100वींवर्षगाठ]
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