Wednesday, March 9, 2011

dainik jagran me chhapa lekh

सबसे मीठी मेवा

Mar 08, 07:42 p
सेवा ऐसी मेवा है, जिसे देने वाले को भी आनंद मिलता है और पाने वाले को भी..। आज पश्चिम के वैज्ञानिक सेवा और परोपकार के गुणों को बढ़ाने के तरीके खोज रहे हैं, लेकिन भारतीय अध्यात्म सदियों से सेवा को विश्व कल्याण का जरिया मानता आया है..
तपते तवे पर ठंडे पानी के चंद छींटे भले ही 'छन्न' की आवाज के साथ विलीन हो जाते हों, लेकिन तवे का तापमान कुछ तो कम कर ही जाते हैं। सेवाभाव भी यही है। सेवा शब्दों से नहीं होती और न ही सेवा का वर्णन शब्द कर पाते हैं। मानवता की सेवा करने वाले हाथ, धर्म की बात करने वाले होठों से कहीं श्रेष्ठ हैं। सेवा भक्ति का सार है। गीता में कहा गया है, 'जो सब जीवों का हित चिंतन करते हैं, वे मुझे प्राप्त हैं।' सेवा में हम जितना स्वयं को लुटाते हैं, उतना ही हमारा हृदय महानता से भर जाता है। सेवा से मानव चेतना असाधारण रूप से विकसित होती है और असीम आनंद मिलता है।
सेवा में देने का भाव प्रमुख है। देने के लिए ही लेना है और देने के लिए ही देना है। देने का भाव कल्याणकारी और लेने का भाव अमंगलकारी है। सेवा करने से व्यवहार भी उत्तम होता है और मोह-माया भी कम हो जाती है। सारे सांसारिक संबंध सेवा के लिए ही हैं। स्वार्थ का त्याग करके दूसरों का हित करना श्रेष्ठ है। परहित के समान कोई धर्म और पर पीड़ा जैसा कोई अधर्म नहीं है-परहित सरिस धर्म नहिं भाई।
गृहस्थाश्रम आर्थिक नहीं, परमार्थिक उन्नति करने की पाठशाला है। परमार्थ यानी ज्यादा लाभ। जहां लाभ नहीं दिखाई देता, वहां सच्चे साधक नहीं रुकते। लेकिन मनुष्य लोभवश मात्र धन संग्रह करता है, क्षमा, दया, त्याग, उदारता, करुणा कोई नहीं जमा करता।
सेवा से व्यक्तित्व का विकास होता है। व्यक्ति स्व की परिधि से ऊपर उठकर पर के विषय में चिंतन करता है, जिससे उसकी सेवा भावना विश्वबंधुत्व के रूप में परिवर्तित हो जाती है।
दधीचि और शिवि ने सेवा धर्म में अपना शरीर अर्पित कर दिया था। सेवा में आत्मा का विस्तार होता है, जो जन-जन के कल्याण की ओर अग्रसर करता है। सेवा व्यक्ति को उन्नति के शिखर पर पहुंचाने में समर्थ है। जिसने भी सेवा की, उसे इस मेवा की मिठास अवश्य मिली। चाहे वे मदर टेरेसा हों, स्वामी विवेकानंद हों या स्वामी दयानंद। इससे एकता के सूत्र में बांधने की दृष्टि मिलती है। सेवा का बीज बोकर समाज के संकट दूर किए जा सकते हैं। श्रेष्ठतम जीवन मूल्यों की रक्षा सेवा से ही संभव है।
तुलसी कहते है, 'सेवा धर्म कठिन जग जाना।' सेवा में स्वाभाविक कष्ट निहित है, अत: यह उदात्त साधना है। लेकिन कष्ट को वहन करके सेवा करने वालों को असीम आनंद भी मिलता है।
सृष्टि और प्रकृति के कण-कण में सेवा का भाव है। सूर्य ऊर्जा देता है, वृक्ष फल देते है। सब एक दूसरे पर निर्भर है। सेवा भाव को विकसित करना होगा। सेवा का भाव कृतज्ञता में जन्मता है। अपने प्रति हुए उपकार को अनुभव करने वाले के मन में अपने उपकारी के हित में कुछ न कुछ करने का भाव जन्म ले लेता है। समाज की पीड़ा को अपनी पीड़ा मानने वाले समाज को सही दिशा देते हैं।
मानव स्वयं में सेवा नारायण है। परोपकार में उसे दिव्य संतोष और सुख मिलता है। शरीर में स्फूर्ति और वाणी में निश्चयात्मक भावना और स्पष्टता समा जाती है। सेवा मानव के उदात्त आदर्श की प्रतीक है। वह ऐसी सुगंध है, जो हवा की तरह लगती है, पर दिखाई नहीं देती।
[डॉ. हरिप्रसाद दुबे]
कैसे आए सेवा भावना..?
पश्चिम में न्यूरो साइंटिस्ट्स और मनोवैज्ञानिकों की टीमें यह पता लगाने में जुटी हैं कि लोगों के मन में करुणा और सेवा भावना जैसे मानवीय गुणों को कैसे बढ़ाया जाए। इस विषय पर दो अलग-अलग स्टडीज में दावा किया गया है कि मेडिटेशन न केवल करुणामयी भावनाओं में वृद्धि करता है, बल्कि शारीरिक और भावनात्मक स्वास्थ्य में भी सुधार लाता है। वहीं, एक वैज्ञानिक अध्ययन यह भी बताता है कि दुनिया में मानवीय गुण जगाने के लिए साथियों का सहयोगात्मक आचरण ही काफी है।
एक अध्ययन में यूनिवर्सिटी ऑफ विसकान्सिन-मेडिसन के शोधकर्ताओं का दावा है कि मेडिटेशन के जरिए करुणा और दया की भावना उत्पन्न करने से हमारे मस्तिष्क के वे हिस्से सक्रिय हो जाते हैं, जो हमें अन्य लोगों की मानसिक स्थिति के प्रति अधिक सवेदनशील बनाते हैं। इस अध्ययन में पहली बार फंक्शनल मैग्नेटिक रिजोनेंस इमेजिंग तकनीक का इस्तेमाल किया गया। इस तकनीक के सहारे शोधकर्ताओं ने यह दर्शाने की कोशिश की कि एक-दूसरे के प्रति नि:स्वार्थ सेवाभाव और करुणा को अच्छी तरह देखा जा सकता है।
पिछले दिनों बोस्टन के हॉर्वर्ड मेडिकल स्कूल के निकोलस क्रिस्टाकिस की टीम ने अपने अध्ययन में पाया कि सहयोगपूर्ण आचरण से सेवा भावना और उदारता बढ़ती है। उनके अध्ययन में यह भावना एक दोस्त से दूसरे दोस्त और दूसरे दोस्त से तीसरे दोस्त तक पहुंचाती है यानी सेवाभावना और परोपकार में संक्रामकता का गुण भी है।

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