न जायते म्रियते व कदाचिन्नायं भूत्वा भविता व न भूयः | अजो नित्यः शाश्वातोयम पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ||
Saturday, December 31, 2011
Wednesday, December 28, 2011
shloka
न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसंगिनाम |
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान युक्तः समाचरन ||
सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत |
कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्शुलोकसंग्रहम ||
ज्ञानी व्यक्ति को कभी भी अज्ञानी की अवश्था के प्रति घृणा प्रदर्शित नहीं करनी चाहिए और न उनकी अपनी अपनी साधन प्रणाली में उनके विश्वास को नष्ट ही करना चाहिए, बल्कि ज्ञानी व्यक्ति को चाहिए कि वह उनको ठीक ठीक मार्ग प्रदर्शित करे, जिससे वे उस अवस्था को पहुँच जाएँ, जहाँ वह स्वयं पंहुचा हुआ है |
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान युक्तः समाचरन ||
सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत |
कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्शुलोकसंग्रहम ||
ज्ञानी व्यक्ति को कभी भी अज्ञानी की अवश्था के प्रति घृणा प्रदर्शित नहीं करनी चाहिए और न उनकी अपनी अपनी साधन प्रणाली में उनके विश्वास को नष्ट ही करना चाहिए, बल्कि ज्ञानी व्यक्ति को चाहिए कि वह उनको ठीक ठीक मार्ग प्रदर्शित करे, जिससे वे उस अवस्था को पहुँच जाएँ, जहाँ वह स्वयं पंहुचा हुआ है |
शब्द
निरतता -- आसक्ति
तितिक्षा*---धैर्य , सहनशीलता
यवस -- घास , दूब
जिगीषा* --- जीतने की इच्छा
तूणीर -- तरकश
त्विषा --- किरण , आभा , ज्योति
Friday, December 23, 2011
QUOTE
Make it a habit to tell people Thank You. To express your appreciation, sincerely and without the expectation of anything in return. Truly appreciate those around you, and you'll soon find many others around you.
-Ralph Marsden
The bond that links your true family is not one of
blood, but of respect and joy in each other's life.
-Richard Bach
Wednesday, December 21, 2011
sheyrrr
गिरते हैं समंदर में बड़े शौक से दरिया
लेकिन किसी दरया में समंदर नहीं गिरता |
हैरान है कई रोज से ठहरा हुआ पानी,
तालाब में अब क्यों कोई कंकर नहीं गिरता |
बैठ जाता हूँ जहाँ छावं घनी होती है,
हाय क्या चीज़ गरीब-उल-वतनी (away from homeland )होती है |
लेकिन किसी दरया में समंदर नहीं गिरता |
हैरान है कई रोज से ठहरा हुआ पानी,
तालाब में अब क्यों कोई कंकर नहीं गिरता |
बैठ जाता हूँ जहाँ छावं घनी होती है,
हाय क्या चीज़ गरीब-उल-वतनी (away from homeland )होती है |
Sunday, December 4, 2011
gazal
लगता नहीं है दिल मेरा उजड़े दयार में
किसकी बनी है आलम-ए-ना-पायदार में
कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें
इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दागदार में
उम्र-ए-दराज़ माँग के लाए थे चार दिन
दो आरजू में कट गए, दो इंतज़ार में
कितना है बदनसीब ज़फर दफ़न के लिए
दो गज ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में
बहादुर शाह ज़फर
किसकी बनी है आलम-ए-ना-पायदार में
कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें
इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दागदार में
उम्र-ए-दराज़ माँग के लाए थे चार दिन
दो आरजू में कट गए, दो इंतज़ार में
कितना है बदनसीब ज़फर दफ़न के लिए
दो गज ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में
बहादुर शाह ज़फर
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