न जायते म्रियते व कदाचिन्नायं भूत्वा भविता व न भूयः | अजो नित्यः शाश्वातोयम पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ||
Sunday, March 27, 2011
Saturday, March 26, 2011
Friday, March 25, 2011
गीता ५/१८
विद्या विनय सम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि |
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिता: समदर्शिन: ||
[गीता ५/१८ ]
पंडितो की अर्थात ज्ञानियों की दृष्टि विद्या- विनय युक्त ब्राह्मण, गाय, हाथी, ऐसे ही कुत्ता और चांडाल,इन सभी के विषय में समान रहती है.
INSPIRATIONAL QUOTATIONS
Anger is an acid that can do more harm to the vessel in which it is stored than to anything
on which it is poured. -Mark Twain
&
To live is the rarest thing in the world. Most people exist, that is all.
-Oscar Wilde
Sunday, March 20, 2011
Saturday, March 19, 2011
Tuesday, March 15, 2011
jagran me chhapa article-chitrakoot
चित्रकूट के घाट पर..
Jan 29, 01:53 pm
प्रागैतिहासिक काल की गुफाओं, झरनों, उच्च शैल शिखरों व हैरान करने वाली कंदराओं के बीच चित्रकूट आज भी विश्वयुगीन समस्याओं के समाधान के केंद्र के रुप में विख्यात है। कर्मकांडीय ब्राहमण हों या फिर राजसत्ता भोगने वाले- सभी यहां आकर नैसर्गिक प्राकृतिक हास्य को देखकर अपनी सुधबुध खो बैठते हैं। शैव, शाक्य, वैष्णव, जैन, प्रणामी संप्रदाय के साथ ही बौद्धों की श्रद्धा का केंद्र चित्रकूट आज भी अपने अतीत के वैभव को जीता सा दिखाई देता है। मुगलिया सल्तनत के दौरान शहंशाह अकबर के दरबार के नौरत्नों में से प्रमुख संगीत सम्राट तानसेन व राजा बीरबल का संबंध भी यहां से रहा है। भक्तिकाल के प्रमुख कवि अब्दुल रहीम खानखाना ने तो अपने बुरे दिनों में यहां पर आकर भाड भूजनें का काम भी किया है। उनके लिखे- चित्रकूट में रम रहे रहिमन अवध नरेश, जापर विपदा परत है सो आवत यहि देश, को आज कौन नही जानता।
धार्मिक स्थल
स्वामी कामतानाथ का मंदिर व परिक्रमा: मान्यताओं के अनुसार आदिकाल में पर्वत से निकलकर प्रभु कामदनाथ विग्रह के रूप में प्रकटे। मानवी काया के अनुसार उनके मुख पर दांत भी हैं। सात शालीग्राम रूपी दांतों में पांच का पूजन रोजाना किया जाता है। साढे पांच किलोमीटर की परिक्रमा मुख्य द्वार से प्रारंभ होती है। चारों दिशाओं में चार द्वार हैं जिनमें विग्रह विराजमान हैं। इसके साथ ही अलौकिक छटायुक्त पर्वत के चारों ओर शनि मंदिर, महलों वाले मंदिर के पीछे गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा लगाया गया पीपल का वृक्ष, उनके द्वारा लिखी गई रामचरितमानस की हस्तलिखित प्रति, मां पयस्वनी का उद्गम स्थल, ब्रह्मकुंड, साक्षी गोपाल, कामधेनु, भरत मिलाप, रामबन पथ गमन स्थल ,लक्ष्मण पहाडी, स्वर्गाश्रम पीलीकोठी, बरहा के हनुमान जी, सरयू धारा आदि स्थान यहां पर देखने योग्य हैं।
मंदाकिनी के घाट: वैसे तो मंदाकिनी अनुसुइया के जंगलों से निकलती हैं। लेकिन इसके बहाव के स्थानों पर अलग-अलग घाट अपनी अलग विशेषताओं के कारण प्रसिद्ध हैं। टाठी घाट जंगलों के मध्य स्थित देवरहा बाबा की साधना का स्थल माना जाता है। यहां की धारा में थाली घूमने लगती है। सर्वाधिक लोकप्रिय स्थल राघव प्रयाग घाट व रामघाट, भरत घाट है। राघव प्रयाग घाट पर सरयू व पयस्वनी का संगम है। यहां पर राम ने अपने पिता दशरथ का पिंड तर्पण किया था। इसके साथ ही यहां पर चित्रकूट के क्षेत्राधिपति स्वयं शंकर स्वामी मत्स्यगयेन्द्र नाथ के विग्रह के रूप में विराजमान हैं। इसके साथ ही स्फटिक शिला पर राम ने मां जानकी का पुष्पों से श्रंगार किया था। यह विशालकाय शिला आज भी अपने पूरे वैभव के साथ मौजूद है। इसके साथ ही जानकीकुंड, पंचवटी घाट, प्रमोदवन घाट, सूरजकुंड का घाट जहां मां मंदाकिनी पश्चिम मुखी हो जाती हैं देखने योग्य हैं।
अनुसुइया आश्रम: महर्षि कर्दम की पुत्री और महर्षि अत्रि की पत्नी महासती अनुसुइया का विशाल गुरुकुल वाला स्थान धर्मनगरी से लगभग 15 किलोमीटर दूर है। यहां पर नैसर्गिक प्राकृतिक सुषमा से युक्त पर्वत व झरनों के साथ सुगंधित जडी बूटियों के पहाड लोगों का मन मोह कर एक नया उत्साह प्रकट करते हैं। यहां पर योगिनी शिला, हनुमान मंदिर, वनवासी राम मंदिर, परमहंस आश्रम आदि दर्शनीय हैं। इसके साथ ही मां मंदाकिनी की सैकडों धाराओं को यहां से निकलते देखा जा सकता है।
अमरावती: राम अपने कुल के पहले चित्रकूट आने वाले वनवासी नही थे। इस बात का प्रमाण आम के वृक्षों की अमराई वाले अमरावती में दिखाई देता है। दृष्टांतों के आधार पर राम की दसवीं पीढी के पूर्वज अयोध्या नरेश महाराज अम्बरीश ने यहां पर आकर कठोर तप किया था। यह स्थान अनुसुइया आश्रम से लगभग तीन किलोमीटर दूर जंगलों के बीच में दुर्गम है।
भभका उद्गम: यह स्थान भी अनुसुइया आश्रम से लगभग दो किलोमीटर दूर झूरी नदी का उद्गम स्थल है। यह स्थान गुरु गोरखनाथ की प्राचीन तपस्या स्थली माना जाता है।
गुप्त गोदावरी: प्रकृति की अनमोल धरोहर गुप्त गोदावरी ऐसा स्थान है जहां पर आकर पर्यटक अपनी सुधबुध खो देता है। प्रकृति की विलक्षण कारीगरी वाली गुफाओं में नक्काशी देखते ही बनती है। एक गुफा तो सूखी है। यहां पर गोदावरी मां के साथ ही अन्य देवता गण स्थापित है और यहां पर राजा इंद्र का पुत्र जयंत खटखटा चोर के रूप में आज भी लटका हुआ है। गोदावरी धारा की विशाल जलराशि वाली दूसरी गुफा से जल निकलकर बाहर कुंड के बाद दिखाई नही देता इसका रहस्य अभी सामने नही आया है।
हनुमान धारा: रामघाट से तीन किलोमीटर दूर पर्वत श्रेणी पर विराजमान हनुमान के हाथों से निकलने वाली धारा का दृश्य अत्यंत मनोहारी है। इसके स्थान के ठीक ऊपर सीता रसोई है। हनुमान धारा के नीचे नरसिंह धारा, पंचमुखी हनुमान मंदिर है। रामघाट से हनुमान धारा जाने के बीच में ही वनदेवी नामक विलक्षण स्थान है।
और भी हैं विलक्षण स्थान
जहां चित्रों के कूट चित्रकूट के दस किलोमीटर के क्षेत्रफल में तमाम मंदिरों के समूह हैं। वहीं धार्मिक, ऐतिहासिक और प्रागैतिहासिक काल के तमाम स्थान अवलोकनीय है।
वाल्मीकि आश्रम लालापुर: महर्षि वाल्मीकि की तपस्थली लालापुर चित्रकूट से इलाहाबाद जाने के रास्ते पर मिलती है। झुकेही से निकली तमसा नदी इस आश्रम के समीप से बहती हुई सिरसर के समीप यमुना में मिल जाती है। पूरी पहाडी पर अलंकृत स्तंभ और शीर्ष वाले प्रस्तर खंड बिखरे पडे हैं जिनसे इस स्थल की प्राचीनता का बोध होता है। इस गुफा में श्वेतवर्ण से अंकित ब्राही लिपि भी मिल चुकी है। चंदेलकालीन आशांबरा देवी का मंदिर इसी स्थान पर है और कहा जाता है कि यही पर स्वामी प्राणनाथ को दिव्य ज्ञान की अनुभूति हुई थी। उन्होंने बाद में पन्ना नगरी में जाकर प्रणामी संप्रदाय की शुरुआत की।
रसियन: चित्रकूट से इलाहाबाद जाते समय मऊ से उत्तर दिशा में 14 किलोमीटर दूर रसियन नामक स्थान पडता है। चौरासी हजार देवताओं की साधनास्थली के बारे में कहा जाता है कि पूज्य देवरहा बाबा ने यहां पर उग्र तप किया था। वैसे यह स्थान चित्रकूट धाम का प्रवेश द्वार भी माना जाता है। बाणासुर की धर्मपत्नी बरहा के नाम पर गांव का नाम ही बरहा कोटरा रख दिया गया था। प्रख्यात शिव मंदिर के ध्वंसावशेष यहां पर बिखरे पडे दिखाई देते हैं। इस मंदिर का सूक्ष्म अलंकरण और भव्य वास्तुकला विस्मित कर देती है। पुरातत्वविद बाणासुर के दुर्ग के पास बने बांध के ध्वंसावशेषों को सिंधु काल की सभ्यता के समकालीन बताते हैं। मन को विस्मित कर देने वाले इस स्थान पर जाते ही अद्भुत शांति का अनुभव होता है। वैसे यहां पर पास ही पहाडी पर आदि काल के मानव-निर्मित शैल चित्रों के साथ ही बौद्ध मूर्तियों के भग्नावशेष भी देखने योग्य हैं। जाने का दुर्गम रास्ता और शासन के ध्यान न देने के कारण पौराणिक, ऐतिहासिक और धार्मिक स्थान लगभग उपेक्षित सा ही है।
बांकेसिद्ध, कोटितीर्थ, देवांगना: चित्रकूट की पंचकोसी यात्रा का प्रथम पडाव अनुसुइया के भ्राता सांख्यदर्शन के प्रणेता महर्षि कपिल का स्थान बांकेसिद्ध के नाम से प्रसिद्ध है। इस गुफा में जहां बीस हजार वर्ष पूर्व के शैल चित्र विद्यमान हैं जो अब मानव भूलों के कारण अंतिम सांसे ले रहे हैं। साल भर गंधक युक्त झरनों और विशेष किस्म के फूलों से सुशोभित इस स्थान को चित्रकूट का हृदय कहा जाता है। देवांगना में भी झरने और पुष्पों की लताओं से लदे पेड दर्शनीय है कोटितीर्थ और पंपासर में हनुमान मंदिर आज भी लाखों लोगों की आस्था का केंद्र हैं। इसके आगे पर्वतीय मार्ग पर सरस्वती नदी, यमतीर्थ, सिद्धाश्रम, गृधाश्रम, मणिकर्णिका आश्रम इत्यादि हैं। पास ही मध्य में चंद्र, सूर्य, वायु, अग्नि और वरुण तीर्थ मिलते हैं। इन पांच देवताओं के यहां पर निवास करने के कारण इसे पंचतीर्थ कहते हैं और कुछ ही दूरी पर ब्रह्मपद तीर्थ है।
मडफा: चित्रकूट से बीस किलोमीटर दूर घुरेटनपुर के पास पर्वत पर भगवान शंकर अपने पंचमुखी रूप में सशरीर विद्यमान हैं। किंवदती के अनुसार ऋषि मांडव्य की इस तपस्थली में महाराज दुष्यंत की पत्नी शकुंतला ने पुत्र भरत को जन्म दिया था। चंदेलकालीन वैभवशाली नगर के ध्वंशावशेष यहां पर बिखरे पडे दिखाई देते हैं। जैन धर्म के प्रर्वतक आदिनाथ के साथ ही अन्य जैन मूर्तियां यहां अपनी बदहाली पर आंसू बहा रही हैं। अत्रि आश्रम: महर्षि वाल्मीकि और महाकवि कालीदास ने इस स्थान का काफी रोचक वर्णन अपने ग्रंथों में किया है। चित्रकूट से लगभग 15 किलोमीटर दूर दक्षिण में मंदाकिनी के किनारे अत्रि-अनुसुइया और उनके पुत्र चंद्रमा, दत्तात्रेय व दुर्वासा के स्थान हैं। यहां पर पाए जाने वाले शैलचित्र इसे पुराप्राचीन काल का घोषित करते हैं। मंदाकिनी नदी के उत्तरी किनारे पर भवनों के ध्वंसावशेष मिलते हैं जो कुलपति कण्व के आश्रम के माने जाते हैं। इस आश्रम की निकटवर्ती पहाडियों पर काफी मात्रा में शैलाश्रय और उनमें रामकथाश्रित शैलचित्र प्राप्त हुए हैं। सप्तर्षियों में सम्मिलित महर्षि अत्रि का विद्यापीठ प्राचीन भारत के महान विद्यापीठों में गिना जाता है। यहां से दंडकारण्य की सीमा प्रारंभ हो जाती है और तीन मील दूर एक झरना और हनुमान जी की मूर्ति प्रतिष्ठित है यहीं पर विराध कुंड है।
शरभंग आश्रम: सतना के वीरसिंहपुर से लगभग 12 किलोमीटर दूर यह स्थान राम और ऋषि शरभंग के अद्भुत मिलन का स्थल है। यहीं पर भगवान विष्णु से कुपित होकर ऋषि ने अपने शरीर का हवन किया था। यहां पर दो दिव्य कुंड हैं जो ऋषि शरभंग के तप बल की पुष्टि करती है। विराध कुंड की गहराई मापने के कई प्रयास हो चुके हैं पर अभी तक इसमें सफलता नही मिली है।
राजापुर: यमुना के किनारे बसी गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज की जन्म स्थली। राम बोला से तुलसीदास जी ने जब रत्नावली के द्वारा ज्ञान प्राप्त किया तो चित्रकूट में आकर गुरु से दीक्षा लेकर रामचरितमानस के साथ ही अनेक ग्रंथ अपने आराध्य राम के बारे में लिख डाले। यहां पर उनके द्वारा स्थापित संकटमोचन हनुमान मंदिर व उनके द्वारा पूजित लगभग 15 किलोमीटर दूर नांदी के हनुमान जी का मंदिर दर्शनीय है। वैसे पहाडी के पास ही साईपुर में दाता साई का मंदिर व स्थान दर्शनीय है। यहां पर हिंदू और मुस्लिम एकता को बढाने वाला मेला लगता है।
कैसे पहुंचे
चित्रकूट के लिए कर्वी निकटतम रेलवे स्टेशन है। यह दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, बनारस, लखनऊ, भोपाल, जबलपुर व रायपुर से सीधा जुडा हुआ है। चित्रकूट से 30 किलोमीटर दूर माणिकपुर जंक्शन भी है। यहां से देश के अन्य भागों के लिए ट्रेने मिलती हैं। इसके साथ ही राष्ट्रीय राजमार्ग 76 पर कर्वी का बस स्टाप है यहां से लखनऊ, बनारस, कानपुर, इलाहाबाद आदि स्थानों के लिए सीधी बस सेवा है। वैसे जानकीकुंड में भी अन्तर्राज्यीय बस स्टैंड हैं। यहां से सतना, रीवा, जबलपुर, पन्ना, मैहर आदि के लिए बसें मिलती हैं। निकटतम हवाई अड्डा खजुराहो, लखनऊ व बनारस हैं। इसके अलावा टैक्सी सेवा हर समय यहां पर मिलती है।
कहां रुकें
चित्रकूट में रुकने के लिए वैसे तो तमाम धर्मशालाएं, लॉज और यात्री निवास हैं। इनमें प्रमुख उप्र और मप्र के टूरिस्ट बंगले, जयपुरिया स्मृति भवन, कामदगिरि भवन, विनोद लाज, पंचवटी ,रामदरबार होटल आदि हैं। वैसे हर मठ और मंदिर ने भी अपने गेस्ट हाउस बना रखे हैं। उत्तर प्रदेश सरकार का विश्राम गृह कर्वी में जबकि मप्र सरकार का विश्राम गृह सिरसावन में है।
घूमने का मौसम
वैसे तो वर्ष भर यहां पर घूमने का मौसम रहता है। पर जुलाई से लेकर मार्च-अप्रैल तक का समय पर्यटकों व दर्शनार्थियों के लिए ज्यादा मुफीद बताया जाता है।
सुतीक्षण आश्रम: वीरसिंहपुर से 10 किलोमीटर दूर यह स्थान शातकर्णी ऋषि के पंचाप्सर तीर्थ और शरभंग आश्रम के मध्य स्थित है। सुतीक्षण के भाई अगस्त्य ऋषि का आश्रम यहां से लगभग 50 किलोमीटर दूर स्थित है। इस स्थान को ब्रह्म लोक के समान पवित्र कहा गया है।
सरहट: चित्रकूट से तीस किलोमीटर दूर मानिकपुर के पास सरहट नामक स्थान पर प्राचीनतम शैलचित्र भारी संख्या में मौजूद हैं। ये तीस हजार साल पुराने बताए जाते हैं। सरहट के पास ही बांसा चूहा, खांभा, चूल्ही में भी इस तरह के शैलचित्र मिलते हैं। सरहट के 20 किलोमीटर दक्षिण पूर्व में करपटिया में 40 शिलाश्रयों का समूह दर्शनीय है।
भरतकूप व रामशैया: चित्रकूट से लगभग 15 किलोमीटर दूर इस स्थान पर राम के राज्याभिषेक के लिए लाए गए सभी नदियों व सरोवर के पवित्र जल को एक कुंए में डाल दिया गया था। यह स्थान दर्शनीय है। यहीं पास में रामशैया नामक स्थान भी है। कहा जाता है कि यहां पर राम ने चित्रकूट में पर्दापण करने के बाद पहली रात्रि का विश्राम किया था। शिवरामपुर के पास पथरौंडी गांव की पहाडी पर भी दाता साई का स्थान है। यहां के बारे में मान्यता है कि जो भी संत इस गद्दी पर विराजमान होता है वह अपनी पूरी जिंदगी पहाड से नीचे नही उतरता। सूरजकुंड: सूर्य भगवान के तप्त वेग के प्रभाव से जहां मंदाकिनी भी पश्चिम मुखी होकर बहने लगती है। सूर्य का प्रभाव यहां पर पत्थरों में नजर आता है। अपने ताप से बचने के लिए ब्राह्मणों को छाता और जूता दान देने की प्रक्रिया की शुरुआत करने वाला स्थान।
धारकुंडी: चित्रकूट से लगभग पचास किलोमीटर दूर जंगलों के मध्य दिव्य स्थान। यहां पर अघमर्षण कुंड पर महाभारत काल में धर्मराज युधिष्ठिर द्वारा यक्ष के प्रश्नों के उत्तर देने के साथ ही स्थानीय जाति की राजकुमारी हिडिंबा का विवाह भीम के साथ होने की कथा कही जाती है। गंधक के साथ ही अन्य जडी बूटियों से मिश्रित झरने के पानी के स्नान व सेवन को चर्म रोगों से मुक्ति का साधन भी माना जाता है।
अन्य दर्शनीय स्थान
बाला जी का मंदिर: चित्रकूट में मंदाकिनी के किनारे शहंशाह औरंगजेब के द्वारा बनवाया गया बाला जी का मंदिर दर्शनीय है।
गणेश बाग: मुंबई में बेसिन की संधि के बाद यहां की जागीर मराठों को देने के बाद उनके वंशज अमृतराय द्वारा बनवाया गया शिल्प का अद्भुत नमूना, इसे मिनी खजुराहो के नाम से भी जाना जाता है। यहां की सात खंडों की बावली भी दर्शनीय है।
तरौंहा का किला व झारखंडी मां का मंदिर: सुर्की राजवंश की अमर कहानी कहता यह किला कर्वी के तरौंहा में स्थित है। वैसे अब तो यह किला बदहाल है पर यहां की वादियों में इतिहास का पूरा एक अध्याय सांस लेता है। बीरबल हों या तानसेन दोनो ही यहां के सुर्की सम्राट राजा राम कृष्ण जूदेव के दरबार से दिल्ली गए थे। यहीं पर मां झारखंडी देवी का मंदिर भी है जिसके बारे में कहा जाता है कि यह देश के 51 शक्तिपीठों में एक है।
चर का सोमनाथ मंदिर: सोमनाथ के मंदिर की तर्ज पर नाम पर बना शिल्प कला का अद्भुत नमूना। यहां पर शिव लिंग के अनेक प्रकार लोगों को मंत्रमुग्ध कर देते हैं। इसके साथ ही दशरथ घाट व कलवलिया का शिव मंदिर भी दर्शनीय है।
चित्रकूट में यहां-यहां पडे राम चरण
जिले के प्रवेश द्वार मुरका नामके गांव का माना जाता है। यहां पर सर्वप्रथम राम के चरण पडे। इसके बाद ऋषियन व सीतापहाडी पर विश्राम करने के बाद व यमुना नदी के गरौली घाट पर आए। यहां पर तेहि अवसर एक तापस आवा वाली घटना हुई। रामनगर के कुमार द्वय तालाब पर स्नान करने के बाद रैपुरा पहुंचे। कहा जाता है कि यहां पर श्रीराम ने अयोध्या से निकलने के बाद पांचवी रात्रि का विश्राम किया। चित्रकूट में प्रवास के दौरान उन्होंने मांडव्य ऋषि के आश्रम मडफा, भरतकूप, अमरावती, विराध कुंड, पुष्करणी सरोवर, मांडकर्णी आश्रम, श्रद्धा पहाड सहित अन्य स्थानों का भ्रमण किया।
लुप्तप्राय स्थान: सुभद्रक कुंड, सर्वतोभद्र कुंड, मणि भद्रक तीर्थ, आर्वे आश्रम, काम स्थान, मंडल तीर्थ, गौरी देवी स्थान, योगिना देवी, भार्गव तीर्थ, सावित्री देवी, दिव्य साकेत, महामाया पीठ, शीतला पीठ, मारकुंडी, वन देवी, हंस तीर्थ, फलकी वन, तुंगारण्य, व्यास कुंड, सारंग ऋषि आश्रम, ब्रहस्पति कुंड।
विशेष स्थान: मारकुंडी के निकट पर्वतों के बीच में चट्टानों से निर्झरित होती विशाल जलराशि जब विशालकाय कुंड में गिरती है तो उसे देखकर लोग आश्चर्यचकित रह जाते हैं। शबरी प्रपात के नाम से विख्यात विशाल कुंड और झरना बाहर से आने वाले पर्यटकों का मन मोह लेता है। यह स्थान शासन की उपेक्षा के चलते अभी ज्यादा ख्याति अर्जित नही कर सका है। अगर इस स्थान पर शासन स्तर पर ध्यान दिया जाए तो यह विशेष स्थान न केवल बाहर से आने वालों के लिए एक विशेष स्थान सिद्ध होगा बल्कि गरीब ग्रामवासियों के लिए रोजगार के साधन मुहैया कराने का भी बडा काम करेगा।
इन स्थानों के अतिरिक्त तमाम और स्थान चित्रकूट के ऊपर लिखे गए लगभग पांच सौ ग्रंथों व पुस्तकों में हैं जिनके बारे में अब जानकारी नही मिलती है।
लेख व फोटो: संदीप रिछारिया
Thursday, March 10, 2011
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