Saturday, February 26, 2011

jagran me chhapa article on 25/2/11


आज फिर है मन 

खुद की खुद से कर लो पहचान..
हो जाएगी हर मुश्किल आसान..
डिस्टालिक, सिस्टालिक के साथ फिजिकल फिटनेस का हर मापदंड आपके शरीर को हरी झंडी दे रहा है, पर.. मन उदास है। रूटीन लाइफ में जब 'लो-नेस' का ब्रेक लगता है तो यूं लगता है कि पूरी दुनिया ही बेरंग हो गयी है। सब कुछ ज्यों का त्यों है कोई बदलाव नहीं हुआ है, पर ये क्या मन की चिड़िया तो न जाने किस आसमान की तलाश में उड़ती ही जा रही है.. लाख जतन के बाद भी मन की उदासी खत्म नहीं होती। आइये जानते है 'मन' की दुनिया के ये कौन से पहलू है।
'मन' तो बच्चा है जी..
प्रमुख कारपोरेट हाउस में कम्पनी सेक्रेटरी नीता बाधवा कहती है 'मन का हाल तो पूछिये मत. बड़े से बड़े उद्योग के अप डाउन को समझा जा सकता है, पर मन तो अचानक ही 'लो' हो जाता है और फिर हफ्तों लग जाते है चार्ज-अप होने में। यह सच है कि 'मन' की उदासी कभी-कभी बेवजह ही हो जाती है, पर 'मन' छोटी-छोटी बातों पर नाखुश होता है तो पलक झपकते कुछ 'अच्छा' होने पर खुश भी तो हो जाता है। फैशन डिजाइनर सृष्टि कहती है 'मैं तो खुद को कभी लो होने ही नहीं देती, मैंने अपने लिये कोई सीमा नहीं बांध रखी है। मैं गुब्बारे से भी खेलती हूं तो कभी जी करने पर एस्कलेटर पर चढ़ती-उतरती रहती हूं।'
वाह ये हुई न बात.. सचमुच जो जी में आये यदि वह किया जाये तो 'मन' मान ही जायेगा। आखिर 'मन' तो बच्चा है।
कहीं आप 'लो-प्रोन' तो नहीं
महीने में एक या दो बार उदासी का दौर सामान्य है। यह हार्मोनल बदलाव, मेंटल कम्पोजिंग या फिजिकल चेंजेज के कारण हो सकती है, पर यदि इसकी फ्रीक्वेन्सी महीने में चार या पांच बार है तो यह एलार्मिग कंडीशन है जिसमें एक्सपर्ट की कन्सलटेंसी महत्वपूर्ण है। डॉ. राजीव अग्रवाल बताते है कि 'नार्मल लो-नेस दो-तीन दिनों में रिवर्ट हो जाती है, पर अच्छी डाइट, रिटर्निग प्रोग्राम फॉलो करने के बाद भी उदासी नहीं जाती तो यह डिप्रेशन भी हो सकता है।'
कुछ लोग बहुत संवेदनशील होते है। आसपास की दुनिया की हर छोटी-छोटी घटनायें उन पर असर डालती हैं। ये हमारे अंदर 'लो-नेस' की टेंडेंसी बना देती है। इनसे बचना जरूरी है जिसके लिये पूरी एक्शन प्लानिंग होनी चाहिये।
बन गए 'लो-नेस' प्रूफ
'स्लीप मोड' में आ गए
जब मन उदास हो तब 'कुछ नहीं करना है' का नारा अपनायें। पूरी तरह खुद को सरेन्डर कर दें। मन के समक्ष खुद विद्रोही न बनें। मसलन खुद पर दबाव न दें। 'हाई-फील' करने के लिये धीरे से 'मन' खुद ब खुद 'एक्टिव मोड' में आ जायेगा।
'हाई-मील' से उदासी फुर्र
जब मन है लो तो डाइट को कीजिये 'हाई'। खूब सारे फ्रूट्स में शहद मिलायें। यदि चखने के बाद नमक की चुटकी डालने का मन है तो बेहिचक मिलाइये और पूरी प्लेट साफ करे। चॉकलेट, काफी या अंगूर और संतरा बेहद कारगर हैं उदासी की चिड़िया फुर्र करने के लिये।
'री-फार्मे¨टग'
आज मन के सिस्टम ने उदासी एक्सप्रेस कर खुद को री-फॉर्मेटिंग की मांग पेश की है। फिर क्या जुट जाइये, पुरानी कड़वाहट, यादें, दुखदायी अनुभव को 'रिसाइकल बिन' में डालिये या डिलीट कीजिये और नयी उमंग, नये लक्ष्य के साथ 'री-स्टार्ट' लें।
आल इज वेल
अपना कर देखिये। जादू का काम करता है 'सब कुछ ठीक है' का ऑटो-सजेशन। यदि हम आल इज वेल का इनपुट देते है तो सचमुच आल इज वेल का आउटपुट ही मिलता है। फिर क्या जिंदगी के हर धक्के पर 'सब ठीक है' का मरहम लगाइये।
वॉक विद टॉक
जो आपको पसंद हो और ज्यादा प्रश्न न पूछता हो ऐसे किसी भी प्रियजन को साथ लें और लंबे डग भरते हुये टहल आयें। मन हो तो रुककर सड़क किनारे लगे हैंडपंप पर देर तक चेहरा धोयें। किसी नुक्कड़ पर लगे ठेले से चाय पिएं और न मन हो तो चुपचाप चलती जायें। आप पाएंगी कि हर बढ़ते कदम के साथ उत्साह अंदर आ रहा है।
उदासी अवसर है उत्साह का
यदि हम कभी लो नहीं होंगे तो क्या इस व्यस्त जीवन में खुद को चार्ज करने के विषय में सोच पायेंगे। निश्चित तौर पर आपका जवाब होगा 'नहीं'। 'लो-नेस' को मूड सिन्ड्रोम न समझकर यदि री-चार्जिग का प्लेटफार्म समझा जाये तो हम बेहतर तौर पर प्लानिंग और डिजाइनिंग की मदद से पुन: उत्साहित हो फ्यूचर स्कीम बना पायेंगे। इसके बहाने स्वमूल्यांकन भी कर सकेंगे। अब सोचना क्या, अगली बार लो-नेस के दौर को 'मेंटल स्पा' से दूर कर रचनात्मक वापसी लें।
[डॉ. लकी चतुर्वेदी बाजपेई : लेखिका साइकोलॉजिकल काउंसलर व कार्पोरेट ट्रेनर ह

Wednesday, February 23, 2011

डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम published article in dainoik jagran

बहुत बुरा लगा था पीछे बैठनाSep 04, 10:24 pmबताएं


Twitter Delicious Facebook यह संयोग भारत में ही संभव हो सकता था कि एक शिक्षक राष्ट्रपति बन जाए और एक राष्ट्रपति शिक्षक। बात हो रही है क्रमश: डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन (जिनका जन्मदिन आज शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जा रहा है) और डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की, जो राष्ट्रपति पद से मुक्त होने के बाद कई शिक्षण संस्थानों में अतिथि शिक्षक के रूप में सेवा दे रहे है। आओ, जानते है डॉ. कलाम के स्कूली दिनों और उन शिक्षकों के बारे में, जिन्होंने उन पर प्रभाव डाला -



मेरा जन्म मद्रास राज्य के रामेश्वरम् कस्बे में एक मध्यमवर्गीय तमिल परिवार में हुआ था। मेरे पिता जैनुलाबदीन की कोई बहुत अच्छी औपचारिक शिक्षा नहीं हुई थी और न ही वे कोई बहुत धनी व्यक्ति थे। इसके बावजूद वे बुद्धिमान थे और उनमें उदारता की सच्ची भावना थी। मेरी मां, आशियम्मा, उनकी आदर्श जीवनसंगिनी थीं। हम लोग अपने पुश्तैनी घर में रहते थे। रामेश्वरम् की मसजिदवाली गली में बना यह घर पक्का और बड़ा था।



[बहुत बुरा लगा था पीछे बैठना]



बचपन में मेरे तीन पक्के दोस्त थे- रामानंद शास्त्री, अरविंदन और शिवप्रकाशन। जब मैं रामेश्वरम् के प्राइमरी स्कूल में पांचवीं कक्षा में था तब एक नए शिक्षक हमारी कक्षा में आए। मैं टोपी पहना करता था, जो मेरे मुसलमान होने का प्रतीक था। कक्षा में मैं हमेशा आगे की पंक्ति में जनेऊ पहने रामानंद के साथ बैठा करता था। नए शिक्षक को एक हिंदू लड़के का मुसलमान लड़के के साथ बैठना अच्छा नहीं लगा। उन्होंने मुझे पीछे वाली बेंच पर चले जाने को कहा। मुझे बहुत बुरा लगा। रामानंद भी मुझे पीछे की पंक्ति में बैठाए जाते देख काफी उदास नजर आ रहा था। स्कूल की छुट्टी होने पर हम घर गए और सारी घटना अपने घरवालों को बताई। यह सुनकर रामानंद के पिता लक्ष्मण शास्त्री ने उस शिक्षक को बुलाया और कहा कि उसे निर्दोष बच्चों के दिमाग में इस तरह सामाजिक असमानता एवं सांप्रदायिकता का विष नहीं घोलना चाहिए। उस शिक्षक ने अपने किए व्यवहार पर न सिर्फ दु:ख व्यक्त किया, बल्कि लक्ष्मण शास्त्री के कड़े रुख एवं धर्मनिरपेक्षता में उनके विश्वास से उस शिक्षक में अंतत: बदलाव आ गया।



[रसोई के रास्ते टूटी रूढि़यां]



प्राइमरी स्कूल में मेरे विज्ञान शिक्षक शिव सुब्रह्मण्य अय्यर कट्टर ब्राह्मण थे, लेकिन वे कुछ-कुछ रूढि़वाद के खिलाफ हो चले थे। वे मेरे साथ काफी समय बिताते थे और कहा करते, 'कलाम, मैं तुम्हे ऐसा बनाना चाहता हूं कि तुम बड़े शहरों के लोगों के बीच एक उच्च शिक्षित व्यक्ति के रूप में पहचाने जाओगे।' एक दिन उन्होंने मुझे अपने घर खाने पर बुलाया। उनकी पत्नी इस बात से बहुत ही परेशान थीं कि उनकी रसोई में एक मुसलमान को भोजन पर आमंत्रित किया गया है। उन्होंने अपनी रसोई के भीतर मुझे खाना खिलाने से साफ इनकार कर दिया। अय्यर जी अपनी पत्नी के इस रुख से जरा भी विचलित नहीं हुए और न ही उन्हे क्रोध आया। उन्होंने खुद अपने हाथ से मुझे खाना परोसा और बाहर आकर मेरे पास ही अपना खाना लेकर बैठ गए। मै खाना खाने के बाद लौटने लगा तो अय्यर जी ने मुझे फिर अगले हफ्ते रात के खाने पर आने को कहा। मेरी हिचकिचाहट को देखते हुए वे बोले, 'इसमें परेशान होने की जरूरत नहीं है। एक बार जब तुम व्यवस्था बदल डालने का फैसला कर लेते हो तो ऐसी समस्याएं सामने आती ही है।' अगले हफ्ते जब मैं उनके घर रात्रिभोज पर गया तो उनकी पत्नी ही मुझे रसोई में ले गई और खुद अपने हाथों से मुझे खाना परोसा।



[तीन ताकतों को समझने का सबक]



15 साल की उम्र में मेरा दाखिला रामेश्वरम् के जिला मुख्यालय रामनाथपुरम् स्थित श्वा‌र्ट्ज हाई स्कूल में हुआ। मेरे एक शिक्षक अयादुरै सोलोमन बहुत ही स्नेही, खुले दिमागवाले व्यक्ति थे और छात्रों का उत्साह बढ़ाते रहते थे। रामनाथपुरम् में रहते हुए अयादुरै सोलोमन से मेरे संबंध काफी प्रगाढ़ हो गए थे। वे कहा करते थे, 'जीवन में सफल होने और नतीजों को हासिल करने के लिए तुम्हे तीन प्रमुख शक्तिशाली ताकतों को समझना चाहिए- इच्छा, आस्था और उम्मीदें।' उन्होंने ही मुझे सिखाया कि मैं जो कुछ भी चाहता हूं, पहले उसके लिए मुझे तीव्र कामना करनी होगी, फिर निश्चित रूप से मैं उसे पा सकूंगा। वे सभी छात्रों को उनके भीतर छिपी शक्ति एवं योग्यता का आभास कराते थे। वे कहा करते थे- 'निष्ठा एवं विश्वास से तुम अपनी नियति बदल सकते हो।'



[पिटाई के बाद मिली प्रशंसा]



श्वा‌र्ट्ज हाई स्कूल में कक्षाएं अहाते में अलग-अलग झुंडों के रूप में लगा करती थीं। एक दिन मेरे गणित के शिक्षक रामकृष्ण अय्यर किसी दूसरी कक्षा को पढ़ा रहे थे। अनजाने में ही मैं उस कक्षा से होकर निकल गया। तुरंत ही उन्होंने मुझे गरदन से पकड़ा और भरी कक्षा के सामने बेंत लगाए। कई महीनों बाद जब गणित में मेरे पूरे नंबर आए तब रामकृष्ण अय्यर ने स्कूल की सुबह की प्रार्थना में सबके सामने यह घटना सुनाई और कहा, 'मैं जिसकी बेंत से पिटाई करता हूं, वह एक महान् व्यक्ति बनता है। मेरे शब्द याद रखिए, यह छात्र विद्यालय और अपने शिक्षकों का गौरव बनने जा रहा है।' आज मैं सोचता हूं कि उनके द्वारा की गई यह प्रशंसा क्या एक भविष्यवाणी थी?





Monday, February 21, 2011

BOOST YOUR BRAIN POWER

 
जागरण समाचार पत्र में छपा यह लेख आपके लिए उपयोगी सिद्ध होगा. कुछा चीजे अवश्य ही अनुकरणीय  है . 
 मस्तिष्क आपके शरीर का शहंशाह है। सस्कृति, सभ्यता और विज्ञान का जो चमत्कारिक विकास हुआ है, उसका बुनियादी कारण मानवीय मस्तिष्क ही है। आपके इस अमूल्य मस्तिष्क की भी कुछ जरूरतें हैं, जिन्हें जानना जरूरी है, तभी आपका मस्तिष्क लबे समय तक
स्वस्थ, सजग और सक्रिय बना रह सकता है..
जॉगिग करें
हाल में ही ब्रिटेन के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में हुए एक अध्ययन के अनुसार हफ्ते में कई बार जॉगिग करना मस्तिष्क की क्षमता व क्रियाशीलता को बढ़ाने में सहायक है। जसलोक हॉस्पिटल के डॉक्टर परेश के. दोषी का कहना है कि व्यायाम करने से मस्तिष्क की कार्यप्रणाली में काफी हद तक सुधार होता है। डॉ. परेश के अनुसार बच्चों पर किए गए एक अध्ययन के अनुसार उन्होंने यह बात दर्ज की है कि जो बच्चे नियमित रूप से व्यायाम करते हैं, उनका शैक्षिक प्रदर्शन उन बच्चों से कहींज्यादा बेहतर रहता है, जो बच्चे व्यायाम नहीं करते। डॉ. परेश के अनुसार प्रतिदिन 20 मिनट तक व्यायाम करने से डीमेंसिया नामक मर्ज होने का जोखिम कम हो जाता है।
बच्चे को स्तन-पान कराएं
हाल में आस्ट्रेलिया में पर्थ के 'टेलीथॉन इंस्टीट्यूट फॉर चाइल्ड हेल्थ रिसर्च' में एक अध्ययन हुआ था। इस अध्ययन के अनुसार जिन बच्चों को उनकी शैशवावस्था में मा ने कम से कम छह महीने या इससे अधिक वक्त तक स्तन-पान कराया था वे बच्चे पढ़ाई-लिखाई में सामान्य बच्चों की तुलना में कहीं ज्यादा आगे रहे। हालाकि इस अध्ययन में 10 साल के बच्चों और खासकर लड़कों को ही शुमार किया गया था। इंस्टीट्यूट के विशेषज्ञों के अनुसार मा के दूध में जो पोषक तत्व पाए जाते हैं, वे मस्तिष्क के विकास में सहायक होते हैं।
सुनिए सगीत
सगीत का मस्तिष्क पर अच्छा असर पड़ता है, लेकिन सगीत का मस्तिष्क पर सबसे उम्दा प्रभाव तब पड़ेगा, जब कोई व्यक्ति मोजार्ट का सगीत सुनें। बहरहाल वरिष्ठ नाक,कान व गला विशेषज्ञ डॉ. देवेन्द्र लालचदानी कहते हैं कि मोजार्ट पाश्चात्य देशों के महान सगीतकार थे। मेरी राय में भारतीय शास्त्रीय सगीत, लोक-सगीत और फिल्म सगीत सुनने का भी मस्तिष्क पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। हा, तेज ध्वनि में सगीत न सुनें। वहीं कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय मे भी सगीत के प्रभाव के सदर्भ में अध्ययन किया गया। इस अध्ययन का निष्कर्ष है कि जिन बच्चों ने पियानो सीखा और सामूहिक गान में नियमित तौर पर भाग लिया, वे पहेलियों व सवालों का जवाब तलाशने में उन बच्चों से कहीं ज्यादा अव्वल रहे, जिन्होंने सगीत का रियाज नहीं किया था।
सुहानी नींद लें
सोना स्वास्थ्य खासकर मस्तिष्क के स्वास्थ्य के लिए सोनाहै। वैज्ञानिकों के अनुसार सोने में ऐसी शक्ति है, जो दिमाग और शरीर की कई शिकायतों को दूर कर आपको स्वस्थ रखने में सहायक है। एक अध्ययन से पता चला है कि सोने की क्रिया न्यूरोजेनेसिस के निर्माण में योगदान देती है। न्यूरोजेनेसिस मस्तिष्क में नई नर्व नर्व सेल के निर्माण में सहायक है। नींद मस्तिष्क के क्रिया कलापों के सुचारु सचालन, ज्ञान-विज्ञान सबधी तथ्यों को सजोने और अच्छी याददाश्त के लिए उपयोगी है।
खेलें वीडियो गेम्स
वीडियो गेम्स खेलने से मस्तिष्क की सजगता बढ़ती है। अमेरिका के रोसेस्टर विश्वविद्यालय में ब्रेन एन्ड कॉग्निटिव साइंसेस विभाग में प्रोफेसर डैफ्नी बीवेलियर के अनुसार वीडियो गेम्स खेलते समय आप एकाग्र होकर फैसले लेते हैं, आपको क्या कदम आगे उठाना है, इन सब बातों पर विचार करते हैं। विश्वविद्यालय में हुए एक अध्ययन के अनुसार जिन लोगों ने मेडल ऑफ ऑनर नामक युद्ध से सबधित हिंसक वार गेम खेला था, उनकी एकाग्रता सामान्य लोगों की तुलना में कहीं ज्यादा दर्ज की गयी।
विदेशी भाषा सीखें
कुछ अध्ययनों से यह बात साबित हुई है कि मातृभाषा के अलावा किसी विदेशी भाषा के सीखने से मस्तिष्क की सक्रियता और एकाग्रता बढ़ती है। इसलिए किसी विदेशी भाषा को सीखें। एक अन्य अध्ययन से यह साबित हुआ है कि जो लोग कम से कम दो भाषाएं जानते हैं, वे सामान्य लोगों की तुलना में एक वक्त में कई काम(मल्टी टास्किंग) करने में कहींज्यादा कुशल होते हैं।
थोड़ी धूप भी लें
धूप में रहने से आपकी त्वचा का रंग कासे की तरह चमकदार ही नहीं होगा, बल्कि एक शोध से यह पता चला है कि सन बर्न की शिकायत भी मस्तिष्क की शक्ति को बढ़ाने और दिमाग से सबधित डीमेंशिया नामक बीमारी की रोकथाम में सहायक है। सूर्य की किरणों में विटामिन डी पाया जाता है, जो मस्तिष्क को सक्रिय रखने का एक सशक्त माध्यम है। 'दि जर्नल ऑफ न्यूरोलॉजी' के अनुसार विटामिन डी मस्तिष्क में सूचनाओं के सग्रह करने की प्रक्रिया को सक्रिय करने में सहायक है। खासकर बढ़ती उम्र के लोगों में। सुबह के समय 15 से 30 मिनट तक धूप में रहना स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है।
करें योग
मस्तिष्क व शरीर को सशक्त करने में व्यायाम के इस विशिष्ट प्रकार यानी योग का जवाब नहीं है। योग सपूर्ण व्यायाम है। योग विशेषज्ञ शमीम अख्तर के अनुसार योग में ऐसे अनेक आसन हैं, जो मस्तिष्क की शक्ति को बढ़ाने में सहायक हैं। आसनों में शरीर अंदर, बाहर व आगे की ओर विभिन्न मुद्राओं में झुकता है। इससे मस्तिष्क को पर्याप्त मात्रा में रक्त की आपूर्ति होती है और यह सजग व सक्रिय बनता है। आसनों की ये मुद्राएं मस्तिष्क को तनावरहित करने में असरकारक हैं। सिर के बल किया जाने वाला शीर्षासन, सर्र्वागासन, पश्चिमोत्तानासन और पर्वतासन से मस्तिष्क की कार्यप्रणाली और याददाश्त अच्छी रहती है, लेकिन इन आसनों को किसी योग विशेषज्ञ के परामर्श के बाद ही शुरू करना चाहिए।
चॉकलेट खाइए..
कुछ अध्ययनों का निष्कर्ष है कि चॉकलेट खाने से मस्तिष्क की एकाग्रता बढ़ती है। अनेक शोध-अनुसधानों से यह बात भी सिद्ध हो चुकी है कि चॉकलेट के अलावा खाने-पीने की कई वस्तुएं ऐसी हैं, जिनके लेने से मस्तिष्क की क्रियाशीलता, एकाग्रता व क्षमता बढ़ती है। इसके अलावा तनाव कम होता है और मस्तिष्क की कोशिकाओं (ब्रेन सेल्स) के क्षीण होने की प्रक्रिया धीमी पड़ जाती है। ऐसे खाद्य पदार्र्थो में होलग्रेन ब्रेड्स और अनाजों को शामिल किया जा सकता है, जिनमें विटामिन बी6 पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है।
विटामिन बी 6 मस्तिष्क के विकास और उसकी क्रियाशीलता को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसी तरह नट्स में जैसे वालनट(अखरोट) में ओमेगा-6 फैटी एसिड्स, ओमेगा-3 फैटी एसिड्स, विटामिन ई और विटामिन बी6 पाए जाते हैं, जो नर्वस सिस्टम को सशक्त बनाते हैं। इसी तरह बादाम में फीनॉयलैलानाइन नामक तत्व पाया जाता है, जो नर्वस सिस्टम के उम्दा स्वास्थ्य के लिए एक महत्वपूर्ण पोषक तत्व है। वहीं ब्लू बेरी मस्तिष्क को तनावमुक्त करने में सहायक ही नहीं बल्कि यह बढ़ती उम्र में होने वाले मस्तिष्क से सबधित रोगों जैसे अल्जाइमर व डीमेंशिया के होने की आशकाओं को भी कम करने में सहायक है। इसी तरह अंडे में कोलीन नामक तत्व पाया जाता है, जो मस्तिष्क में स्थित स्मृति केंद्रों को सशक्त बनाता है, जिसके कारण याददाश्त अच्छी बनी रहती है।
['मिड डे']

BEGINNING-2011

NO IDEAS ORIGINAL
THERE IS NOTHING NEW
UNDER THE SUN
ITS NEVER WHAT YOU DO
BUT HOW IT IS DONE