खुद की खुद से कर लो पहचान..
हो जाएगी हर मुश्किल आसान..
डिस्टालिक, सिस्टालिक के साथ फिजिकल फिटनेस का हर मापदंड आपके शरीर को हरी झंडी दे रहा है, पर.. मन उदास है। रूटीन लाइफ में जब 'लो-नेस' का ब्रेक लगता है तो यूं लगता है कि पूरी दुनिया ही बेरंग हो गयी है। सब कुछ ज्यों का त्यों है कोई बदलाव नहीं हुआ है, पर ये क्या मन की चिड़िया तो न जाने किस आसमान की तलाश में उड़ती ही जा रही है.. लाख जतन के बाद भी मन की उदासी खत्म नहीं होती। आइये जानते है 'मन' की दुनिया के ये कौन से पहलू है।
'मन' तो बच्चा है जी..
प्रमुख कारपोरेट हाउस में कम्पनी सेक्रेटरी नीता बाधवा कहती है 'मन का हाल तो पूछिये मत. बड़े से बड़े उद्योग के अप डाउन को समझा जा सकता है, पर मन तो अचानक ही 'लो' हो जाता है और फिर हफ्तों लग जाते है चार्ज-अप होने में। यह सच है कि 'मन' की उदासी कभी-कभी बेवजह ही हो जाती है, पर 'मन' छोटी-छोटी बातों पर नाखुश होता है तो पलक झपकते कुछ 'अच्छा' होने पर खुश भी तो हो जाता है। फैशन डिजाइनर सृष्टि कहती है 'मैं तो खुद को कभी लो होने ही नहीं देती, मैंने अपने लिये कोई सीमा नहीं बांध रखी है। मैं गुब्बारे से भी खेलती हूं तो कभी जी करने पर एस्कलेटर पर चढ़ती-उतरती रहती हूं।'
वाह ये हुई न बात.. सचमुच जो जी में आये यदि वह किया जाये तो 'मन' मान ही जायेगा। आखिर 'मन' तो बच्चा है।
कहीं आप 'लो-प्रोन' तो नहीं
महीने में एक या दो बार उदासी का दौर सामान्य है। यह हार्मोनल बदलाव, मेंटल कम्पोजिंग या फिजिकल चेंजेज के कारण हो सकती है, पर यदि इसकी फ्रीक्वेन्सी महीने में चार या पांच बार है तो यह एलार्मिग कंडीशन है जिसमें एक्सपर्ट की कन्सलटेंसी महत्वपूर्ण है। डॉ. राजीव अग्रवाल बताते है कि 'नार्मल लो-नेस दो-तीन दिनों में रिवर्ट हो जाती है, पर अच्छी डाइट, रिटर्निग प्रोग्राम फॉलो करने के बाद भी उदासी नहीं जाती तो यह डिप्रेशन भी हो सकता है।'
कुछ लोग बहुत संवेदनशील होते है। आसपास की दुनिया की हर छोटी-छोटी घटनायें उन पर असर डालती हैं। ये हमारे अंदर 'लो-नेस' की टेंडेंसी बना देती है। इनसे बचना जरूरी है जिसके लिये पूरी एक्शन प्लानिंग होनी चाहिये।
बन गए 'लो-नेस' प्रूफ
'स्लीप मोड' में आ गए
जब मन उदास हो तब 'कुछ नहीं करना है' का नारा अपनायें। पूरी तरह खुद को सरेन्डर कर दें। मन के समक्ष खुद विद्रोही न बनें। मसलन खुद पर दबाव न दें। 'हाई-फील' करने के लिये धीरे से 'मन' खुद ब खुद 'एक्टिव मोड' में आ जायेगा।
'हाई-मील' से उदासी फुर्र
जब मन है लो तो डाइट को कीजिये 'हाई'। खूब सारे फ्रूट्स में शहद मिलायें। यदि चखने के बाद नमक की चुटकी डालने का मन है तो बेहिचक मिलाइये और पूरी प्लेट साफ करे। चॉकलेट, काफी या अंगूर और संतरा बेहद कारगर हैं उदासी की चिड़िया फुर्र करने के लिये।
'री-फार्मे¨टग'
आज मन के सिस्टम ने उदासी एक्सप्रेस कर खुद को री-फॉर्मेटिंग की मांग पेश की है। फिर क्या जुट जाइये, पुरानी कड़वाहट, यादें, दुखदायी अनुभव को 'रिसाइकल बिन' में डालिये या डिलीट कीजिये और नयी उमंग, नये लक्ष्य के साथ 'री-स्टार्ट' लें।
आल इज वेल
अपना कर देखिये। जादू का काम करता है 'सब कुछ ठीक है' का ऑटो-सजेशन। यदि हम आल इज वेल का इनपुट देते है तो सचमुच आल इज वेल का आउटपुट ही मिलता है। फिर क्या जिंदगी के हर धक्के पर 'सब ठीक है' का मरहम लगाइये।
वॉक विद टॉक
जो आपको पसंद हो और ज्यादा प्रश्न न पूछता हो ऐसे किसी भी प्रियजन को साथ लें और लंबे डग भरते हुये टहल आयें। मन हो तो रुककर सड़क किनारे लगे हैंडपंप पर देर तक चेहरा धोयें। किसी नुक्कड़ पर लगे ठेले से चाय पिएं और न मन हो तो चुपचाप चलती जायें। आप पाएंगी कि हर बढ़ते कदम के साथ उत्साह अंदर आ रहा है।
उदासी अवसर है उत्साह का
यदि हम कभी लो नहीं होंगे तो क्या इस व्यस्त जीवन में खुद को चार्ज करने के विषय में सोच पायेंगे। निश्चित तौर पर आपका जवाब होगा 'नहीं'। 'लो-नेस' को मूड सिन्ड्रोम न समझकर यदि री-चार्जिग का प्लेटफार्म समझा जाये तो हम बेहतर तौर पर प्लानिंग और डिजाइनिंग की मदद से पुन: उत्साहित हो फ्यूचर स्कीम बना पायेंगे। इसके बहाने स्वमूल्यांकन भी कर सकेंगे। अब सोचना क्या, अगली बार लो-नेस के दौर को 'मेंटल स्पा' से दूर कर रचनात्मक वापसी लें।
[डॉ. लकी चतुर्वेदी बाजपेई : लेखिका साइकोलॉजिकल काउंसलर व कार्पोरेट ट्रेनर ह
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